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    10 hours ago

    *चंदाना-बिंजाना में मौतों से उजड़े परिवार,भाजपा नेताओं की गैरमौजूदगी पर उठ रहे सवाल!*

    *गांव में मातम, परिवारों पर दुखों का पहाड़; एसपी-कलेक्टर के तबादलों की चर्चा के बीच सत्ताधारी नेताओं की संवेदनशीलता पर उठ रहे सवाल*

    देवास से चंद्रकांत भोसले

    देवास। जिले के ग्राम चंदाना और बिंजाना में शराब के सेवन से मौतों को लेकर उठे मामले ने कई परिवारों को गहरे दुख में डाल दिया है। जिन घरों में कभी अपनों की मौजूदगी से रौनक रहती थी, वहां अब अपनों को खोने का दर्द है। परिवारों के लिए यह केवल किसी व्यक्ति की मृत्यु का मामला नहीं, बल्कि जीवनभर की पीड़ा और भविष्य से जुड़ी चिंताओं का विषय है। ऐसे कठिन समय में प्रभावित परिवारों को सामाजिक सहयोग, प्रशासनिक मदद और  स्थानीय जनप्रतिनिधियों के संबल की आवश्यकता होती है। लेकिन शहर में अब इस बात को लेकर चर्चा हो रही है कि क्या इन परिवारों तक राजनीतिक नेतृत्व की संवेदनाएं पहुंचीं?

    मौतों के मामले में संवेदना जताने भी नहीं पहुंचे नेता?

    ग्राम चंदाना और बिंजाना में हुई मौतों का मामला सामने आने के बाद शहर के राजनीतिक गलियारों में भी हलचल होनी चाहिए थी। आमतौर पर किसी भी दुखद घटना के बाद सत्ताधारी नेता पीड़ित परिवारों से मिलकर उनका दुख बांटते हैं, उनकी समस्याएं सुनते हैं और जरूरत पड़ने पर सहायता के लिए आगे आते हैं। लेकिन स्थानीय स्तर पर यह सवाल उठ रहा है कि भारतीय जनता पार्टी के शहर के प्रमुख नेताओं की ओर से प्रभावित परिवारों के प्रति संवेदना व्यक्त करने या उनसे मिलने की कोई सार्वजनिक जानकारी सामने क्यों नहीं आई?
    यदि वास्तव में सत्ताधारी नेता प्रभावित परिवारों तक नहीं पहुंचे हैं, तो यह स्थिति स्थानीय नेताओं की सामाजिक जिम्मेदारी और जनता के प्रति जवाबदेही पर सवाल खड़े करती है। आखिर जिन लोगों को जनता अपना प्रतिनिधि चुनती है, उनसे संकट के समय पीड़ितों के साथ खड़े रहने की अपेक्षा करना क्या गलत है?

    एसपी-कलेक्टर के तबादलों की चर्चा, लेकिन पीड़ित परिवारों का दर्द कौन सुनेगा?

    इस पूरे मामले के बीच जिले के पुलिस अधीक्षक और कलेक्टर के तबादलों को लेकर भी चर्चा है। हालांकि, किसी अधिकारी का तबादला अपने आप में यह साबित नहीं करता कि वह इस घटना के लिए जिम्मेदार था या उसके विरुद्ध कोई कार्रवाई हुई है। ऐसे मामलों में वास्तविक स्थिति आधिकारिक जानकारी और जांच के निष्कर्षों से ही स्पष्ट होती है। लेकिन सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि प्रशासनिक फेरबदल और राजनीतिक चर्चाओं के बीच उन परिवारों की सुध कौन ले रहा है, जिन्होंने अपने परिजनों को खोया है? क्या किसी सत्ताधारी नेता ने उनके दुख-दर्द को समझने, उनकी जरूरतों का पता लगाने और उन्हें उचित सहायता दिलाने की पहल की? इन सवालों का जवाब सामने आना जरूरी है, क्योंकि किसी भी घटना के बाद केवल प्रशासनिक गतिविधियां ही पर्याप्त नहीं होतीं। पीड़ित परिवारों को यह भरोसा भी मिलना चाहिए कि समाज और जनप्रतिनिधि उनके साथ खड़े हैं।

    गली-मोहल्लों में चर्चा, संवेदनशीलता को लेकर उठ रहे सवाल

    चंदाना-बिंजाना की घटना को लेकर शहर के गली-मोहल्लों और चौराहों पर चर्चा होने की बात सामने आ रही है। लोगों के बीच यह सवाल उठ रहा है कि जब किसी घटना में परिवारों की खुशियां उजड़ जाती हैं, तब जनप्रतिनिधियों की भूमिका क्या होनी चाहिए? क्या उनकी जिम्मेदारी केवल राजनीतिक कार्यक्रमों, सार्वजनिक आयोजनों और औपचारिक मुलाकातों तक सीमित है, या फिर दुख की घड़ी में जरूरतमंदों के बीच पहुंचना भी उनके दायित्व का हिस्सा है? जनता अपने जनप्रतिनिधियों से केवल विकास कार्यों की घोषणाओं की अपेक्षा नहीं करती, बल्कि संकट के समय मानवीय संवेदना और सहयोग की उम्मीद भी रखती है। ऐसे समय में पीड़ित परिवारों से मुलाकात, उनकी बात सुनना और जरूरत के अनुसार सहायता दिलाने का प्रयास राजनीतिक औपचारिकता नहीं, बल्कि मानवीय जिम्मेदारी है।

    बड़ा सवाल: जनता के दुख में भागीदार कौन बनेगा?

    चंदाना-बिंजाना की घटना ने एक बार फिर सत्ताधारी  नेताओं की सामाजिक भूमिका पर बहस छेड़ दी है। राजनीतिक दलों और नेताओं से जनता की अपेक्षा रहती है कि वे केवल सार्वजनिक मंचों पर ही नहीं, बल्कि दुख की घड़ी में भी लोगों के बीच दिखाई दें। अब देखना यह है कि शहर के भाजपा नेता प्रभावित परिवारों से मुलाकात कर उनकी समस्याएं सुनते हैं या नहीं। क्या वे पीड़ितों को सहायता दिलाने के लिए आगे आएंगे? क्या वे इस मामले में जांच की पारदर्शिता और जिम्मेदारों पर नियमानुसार कार्रवाई की मांग करेंगे? सवाल यही है कि जिन परिवारों ने अपनों को खोया है, उन्हें न्याय और सहायता दिलाने के लिए कौन आगे आएगा?

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    34 साल 7 माह की सेवा के बाद अशोक वर्मा सेवानिवृत्त, स्वास्थ्य विभाग ने दी भावभीनी विदाई

    सीएमएचओ कार्यालय में आयोजित हुआ सम्मान समारोह, अधिकारियों-कर्मचारियों एवं कर्मचारी संगठनों ने किया अभिनंदनदेवास। स्वास्थ्य…
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    August 27, 2026

    शिक्षक संगठनों के संयुक्त मोर्चा ने सौंपा ज्ञापन, मांगें नहीं मानी तो शिक्षक दिवस पर करेंगे विरोध

    देवास। शिक्षकों की विभिन्न समस्याओं एवं मांगों को लेकर शिक्षक संगठनों के संयुक्त मोर्चा ने…
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    August 27, 2026

    *शिक्षक संगठनों के संयुक्त मोर्चा ने सौंपा ज्ञापन, मांगें नहीं मानी तो शिक्षक दिवस पर करेंगे विरोध*

    देवास। शिक्षकों की विभिन्न समस्याओं एवं मांगों को लेकर शिक्षक संगठनों के संयुक्त मोर्चा ने जिला शिक्षा अधिकारी राजीव सूर्यवंशी को ज्ञापन सौंपा। ज्ञापन में विद्यालयों में लागू की जा रही ई-अटेंडेंस व्यवस्था तथा कार्यरत शिक्षकों के लिए टीईटी परीक्षा की पुनः अनिवार्यता के प्रस्ताव पर पुनर्विचार करने की मांग की गई। शिक्षक संगठनों ने कहा कि शिक्षक समाज राष्ट्र निर्माण एवं विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। शिक्षकों की उपस्थिति का निर्धारण केवल तकनीकी माध्यम से न होकर विद्यालयीन व्यवस्था एवं वास्तविक उपस्थिति के आधार पर किया जाना चाहिए। साथ ही लंबे समय से शासकीय सेवा में कार्यरत एवं अपने दायित्वों का निर्वहन कर रहे शिक्षकों पर टीईटी परीक्षा की पुनः अनिवार्यता लागू करने के निर्णय पर भी पुनर्विचार किया जाए। ज्ञापन के माध्यम से चेतावनी दी गई कि यदि समस्याओं एवं मांगों पर उचित निर्णय नहीं लिया गया तो 5 सितंबर शिक्षक दिवस के अवसर पर शिक्षक हाथ पर काली पट्टी बांधकर कार्य करेंगे तथा किसी भी प्रकार का शिक्षक सम्मान ग्रहण नहीं करेंगे। ज्ञापन का वाचन ज्योति वडेकर ने किया, जबकि आभार पुरुषोत्तम सिंह सिसौदिया ने माना। इस अवसर पर रजनीश पोरवाल, शेख साबिर, दिनेश चौधरी, अरुण मिश्रा, दुर्गेश जाजू, मतीन खान, अजय सिंह गौड़, लक्ष्मी माली, सुनील कुमावत, निर्मला सिंह, रागिनी त्यागी, निर्दोष तिर्की, संगीता राठौर, अनिता पंचोली, सुरेशचंद्र माली, जगदीश राठौर, अर्जुनसिंह मालवीय, दीपक वर्मा, सरदार सिंह मालवीय, जितेंद्र मालवीय, हजारीलाल चौहान, दशरथ सिंह पटेल, किशोर वर्मा, दिनेश परमार सहित अन्य शिक्षक उपस्थित रहे।

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      इस पूरे मामले के बीच जिले के पुलिस अधीक्षक और कलेक्टर के तबादलों को लेकर भी चर्चा है। हालांकि, किसी अधिकारी का तबादला अपने आप में यह साबित नहीं करता कि वह इस घटना के लिए जिम्मेदार था या उसके विरुद्ध कोई कार्रवाई हुई है। ऐसे मामलों में वास्तविक स्थिति आधिकारिक जानकारी और जांच के निष्कर्षों से ही स्पष्ट होती है। लेकिन सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि प्रशासनिक फेरबदल और राजनीतिक चर्चाओं के बीच उन परिवारों की सुध कौन ले रहा है, जिन्होंने अपने परिजनों को खोया है? क्या किसी सत्ताधारी नेता ने उनके दुख-दर्द को समझने, उनकी जरूरतों का पता लगाने और उन्हें उचित सहायता दिलाने की पहल की? इन सवालों का जवाब सामने आना जरूरी है, क्योंकि किसी भी घटना के बाद केवल प्रशासनिक गतिविधियां ही पर्याप्त नहीं होतीं। पीड़ित परिवारों को यह भरोसा भी मिलना चाहिए कि समाज और जनप्रतिनिधि उनके साथ खड़े हैं।

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      September 1, 2026

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